
समझें क्या है पूरा मामला
- पत्नी ने पति से होटल में दूसरी महिला के साथ ठहरने का कारण पूछा।
- पति इसे निजता का हनन बताते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया था।
- कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद पत्नी के पक्ष में अहम फैसला सुनाया।
- कोर्ट ने कहा कि निजता के अधिकार का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता है।
- दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को भी बरकरार रखा गया है।
पूरा विवाद कैसे शुरू हुआ
पति और पत्नी की शादी 1998 में हुई थी। साल दो हजार में दोनों को एक बेटी हुई। कुछ समय बाद पत्नी को पति के किसी अन्य महिला के साथ संबंधों की जानकारी मिली। पता चला कि पति उस महिला के साथ जयपुर के एक होटल में ठहरा था। इस धोखे के बाद पत्नी ने अदालत का रुख किया। उसने व्यभिचार के आधार पर तलाक की मांग रखी।
पत्नी ने मांगे थे सबूत
अपने आरोप को साबित करने के लिए पत्नी ने पति के कॉल रिकॉर्ड मांगे। साथ ही होटल में ठहरने की डिटेल भी अदालत से मांगी गई। पति ने इस मांग का विरोध किया। उसका कहना था कि यह जानकारी उसकी निजता का हिस्सा है। इसे किसी के साथ साझा करना उसके अधिकारों का हनन होगा।
नीजता का अधिकार क्या है?
निजता का अधिकार में व्यक्ति को अपनी व्यक्तिगत जिंदगी, डेटा और सूचनाओं को दूसरों की दखलंदाजी से सुरक्षित रखने का अधिकार देता है। भारत में इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक अभिन्न हिस्सा माना गया है।
फैमिली कोर्ट और हाईकोर्ट का रुख
फैमिली कोर्ट ने पत्नी के पक्ष में आदेश दिया। कोर्ट ने पति को कॉल डिटेल और होटल स्टे की जानकारी देने को कहा। पति ने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने भी फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि निजता के अधिकार पर उचित कारणों से रोक लगाई जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा मामला
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ पति सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। उसने वहां भी अपनी निजता का हवाला दिया। जस्टिस मनमोहन और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें ध्यान से सुनीं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक को निजता का अधिकार मिला है। लेकिन इस अधिकार का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता है।
बेंच ने कहा कि पति या पत्नी अपने जीवनसाथी से जरूरी जानकारी छिपाने के लिए निजता का सहारा नहीं ले सकते हैं। खासकर तब जब मामला जीवनसाथी को व्यभिचारी साबित करने से जुड़ा हो।
दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर दी। साथ ही दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा। इसका मतलब है कि पति को अब कॉल रिकॉर्ड और होटल स्टे की जानकारी पत्नी को देनी होगी। यह फैसला पति-पत्नी (पति पत्नी विवाद) के बीच निजता के दायरे को स्पष्ट करने वाला माना जा रहा है।
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