News Strike | न्यूज स्ट्राइक : नीट पेपर लीक, टीईटी पेपर लीक के बीच मप्र की भी तीन भर्ती प्रक्रिया या परीक्षा अब सवालों के घेरे में आ गई हैं। इन तीन परीक्षाओं के अलग-अलग मापदंडों पर प्रश्नचिन्ह लगा है।
इस संबंध में या तो सोशल मीडिया पर सवाल उठे हैं या फिर पत्र लिखकर बात की गई है। ये परीक्षाएं या भर्ती प्रक्रिया कौन-कौन सी हैं। इन पर आज आपसे बात करेंगे और एक-एक कर बताएंगे कि किस पहलू पर ज्यादा सवाल उठा जा रहे हैं।
एक तबके का पक्ष हो सकता है कि इन परीक्षाओं में आरक्षण का मुद्दा उठाकर राजनेता अपनी राजनीति चमका रहे हैं। शायद एक पक्ष ये हो कि रोजगार के साथ-साथ आरक्षण की बात करना भी जरूरी है।
कृषि भर्ती में आरक्षण पर सवाल
समूह 2 उपसमूह 1 के तहत कृषि विस्तार अधिकारी भर्ती परीक्षा 2026, एमपपीएसी डेंटल सर्जन भर्ती परिणाम और एक अभ्यर्थी का परीक्षा को लेकर पत्र। इन तीन बिंदुओं पर हम आपसे बात करेंगे।
शुरुआत हम कृषि विस्तार अधिकारी भर्ती से करते हैं। हीरालाल अलावा ने इस भर्ती परीक्षा की आरक्षण व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इस संबंध में ट्वीट किया है कि परीक्षा के तहत इस साल 2784 पद घोषित किए गए हैं। इसके बाद उन्होंने पदों का रिजर्व कोटे में डिस्ट्रिब्यूशन भी बताया है।
अलावा के पोस्ट के मुताबिक अनरिजर्व कोटे में 1126 पोस्ट है। इसके बाद ईडब्ल्यूएस के लिए 444, ओबीसी के लिए 316, एससी के लिए 122 और एसटी के लिए भी 122 पद रखे गए हैं।
आरक्षण रोस्टर पर फिर उठे सवाल
अलावा ने इन पदों की संख्या पर सवाल उठाए हैं और लिखा है कि मप्र आदिवासी बहुल राज्य है। जहां अनुसूचित जनजाति की आबादी करीब 21 फीसदी है। उनका कहना है कि इतनी बड़ी आबादी के लिए सिर्फ 122 पदों की संख्या निर्धारित करना आदिवासियों की अनदेखी के समान है। इससे आरक्षण की भावना पर भी सवाल उठते हैं।
अलावा की मांग है कि सरकार रिजर्वेशन रोस्टर को एक बार फिर रिव्यू करे। यदि पदों की संख्या निर्धारित करने में कोई गलती हुई है तो उसे भी सुधाने की अपील की है। उनका कहना है कि आदिवासी युवाओं को भी सरकारी नौकरी के समान अवसर मिलना चाहिए।
दूसरा मामला एमपीपीएससी डेंटल सर्जन भर्ती प्रक्रिया का है। जिसके संबंध में एक पत्र लिखा गया है। यहां भी मामला आरक्षण से जुड़ा हुआ ही है। पत्र के मुताबिक ओबीसी पदों को खाली रखा गया है।
इस पर सवाल उठा है कि अगर ओबीसी वर्ग के योग्य उम्मीदवार मौजूद थे तो पदों को खाली क्यों रखा गया है। तर्क दिया गया है कि योग्य उम्मीदवार होने के बावजूद पद खाली रखना न्यायसंगत नहीं है।
EWS सीटों पर नया सवाल
इस परीक्षा के लिए ईड्ब्लूएस यानी कि फाइनेंशियल वीकर सेक्शन वाले वर्ग के लिए रखी गई सीटों की संख्या पर भी सवाल उठे हैं। पत्र के मुताबिक इस सेक्शन के लिए दस प्रतिशत पद आरक्षित रखने का नियम है, लेकिन जितने पद रखें गए हैं वो इस मापदंड के अनुसार नहीं है।
परीक्षा पहले 385 पोस्ट के लिए थी, लेकिन बाद में इसे 341 कर दिया गया। दस प्रतिशत के नियम के अनुसार पहले 38 पद रखे गए थे। कुल पदों की संख्या घटने के बाद भी ईडब्लूएस के पदों को घटाकर 34 नहीं किया गया।
भर्ती में खाली पदों पर उठे सवाल
पत्र के मुताबिक 48 में से 12 पोस्ट अब भी खाली हैं। उन पर भी सवाल है। ओबीसी समुदाय के आरक्षण को लेकर मामला अदालत में है। इसके अलावा एससी और एसटी वर्ग की भी कुछ पोस्ट खाली रखी गई हैं। पत्र के जरिए भर्ती प्रक्रिया को और स्पष्ट करने की अपील की गई है। सबसे ज्यादा जोर ओबीसी वर्ग की परीक्षाओं पर है।
हमने अभी आपसे जिन दो परीक्षाओं का जिक्र किया उसमें से एक कृषि विस्तार अधिकारी की वेकेंसी के लिए राजनीतिक शख्सियत ने आवाज उठाई है और डेंटल सर्जन की भर्ती के लिए प्रक्रिया स्पष्ट करने की मांग की गई है। इसे देखकर क्या ये सवाल जेहन में नहीं आता कि युवाओं के रोजगार के नाम पर भी आरक्षण का खेल जारी है।
भर्ती आरक्षण बनेगा चुनावी मुद्दा?
क्या आने वाले चुनाव में भर्ती परीक्षाओं पर भी आरक्षण का मामला एक बड़ा मुद्दा बनेगा। ऐसा हो तो ज्यादा हैरानी भी नहीं होगी। क्योंकि भर्ती परीक्षा और नौकरी के बाद भी आरक्षण का मुद्दा काफी गंभीर बना हुआ है।
प्रमोशन में आरक्षण पर चल रही लंबी कानूनी लड़ाई इसका बड़ा उदाहरण है। जब हर बार लगता है कि इस पर कोई फैसला आएगा। कोई न कोई कानूनी पेंच उलझ जाता है। जिसका नतीजा ये है कि पहले भी कई अधिकारी कर्मचारी बिना प्रमोशन के रिटायर हो गए। मप्र के सरकारी विभागों में कई पद इस वजह से खाली पड़े हैं और कई युवाओं को इस वजह से नौकरी नहीं मिल पा रही।
भर्ती उलझी तो युवाओं पर मार
अब अलग-अलग प्लेटफॉर्म या अलग-अलग जरियों से आए ये सवाल फिर पूरी प्रक्रिया को सवालों में उलझा सकते हैं। इसका नतीजा क्या होगा। जाहिर है कुछ नेताओं की राजनीति चमक जाए। लेकिन ये भी सही है कि इन सवालों में उलझ कर भर्ती प्रक्रिया उलझी तो कई युवा रोजगार से वापस दूर हो जाएंगे।
युवाओं का दर्द समझना है तो एमपीपीएससी के एक अभ्यर्थी का पत्र भी सुनिए। पत्र तकनीकि भाषा में ज्यादा है। हम उसे आसान भाषा में समझाने की कोशिश करता हूं।
एक महीने में चार परीक्षाओं का दबाव
मध्यप्रदेश के हजारों MPPSC अभ्यर्थी इस समय एक बड़ी परेशानी का सामना कर रहे हैं। वजह है आयोग का परीक्षा शेड्यूल। 2 अगस्त 2026 को कई विषयों की सहायक प्राध्यापक परीक्षा है। इसके सिर्फ 6 दिन बाद, 8 अगस्त से राज्य सेवा मुख्य परीक्षा 2025 शुरू हो रही है।
फिर 30 अगस्त को सहायक प्राध्यापक की दूसरी बड़ी परीक्षा होगी और उसके केवल 7 दिन बाद, 7 सितंबर से राज्य सेवा मुख्य परीक्षा 2026 भी शुरू हो जाएगी। यानी एक ही महीने में चार बड़ी परीक्षाएं। ऐसे में अभ्यर्थी किसी भी परीक्षा की अच्छी तैयारी नहीं कर पा रहे हैं।
पास-पास परीक्षाओं से फोकस बिगड़ा
पत्र के मुताबिक आज राज्य सेवा में पद भी पहले की तुलना में कम हो गए हैं। पत्र में 8:13 के नियम के हवाले से ये बात कही गई है और आगे लिखा है कि इसलिए ज्यादातर छात्र सिर्फ एक परीक्षा पर निर्भर नहीं रहते। वो राज्य सेवा, सहायक प्राध्यापक और दूसरी भर्तियों की भी तैयारी करते हैं, लेकिन जब सभी परीक्षाएं इतनी पास-पास हों तो किसी एक पर पूरा फोकस करना मुश्किल हो जाता है।
मुख्य परीक्षा 2026 आगे बढ़ाने की मांग
हमारी मांग ये नहीं है कि सभी परीक्षाएं टाल दी जाएं। सहायक प्राध्यापक परीक्षा और राज्य सेवा मुख्य परीक्षा 2025 तय समय पर हो सकती हैं, लेकिन राज्य सेवा मुख्य परीक्षा 2026 को कुछ समय आगे बढ़ाने पर जरूर विचार होना चाहिए।
इससे छात्रों को बेहतर तैयारी का समय मिलेगा और आयोग को भी कॉपियों के मूल्यांकन और दूसरी प्रशासनिक प्रक्रियाओं के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा। उम्मीद है कि सरकार और MPPSC इस मांग पर गंभीरता से विचार करेंगे।
भर्ती सिस्टम से टूटती युवाओं की उम्मीद
ये महज एक पत्र नहीं है। ये दर्द है उन युवाओं का जो हर दिन भर्ती परीक्षा की तैयारी करते हैं और परीक्षा का इंतजार करते हैं। कभी परीक्षा की डेट्स के साथ एडजस्टमेंट होता है तो कभी परीक्षा रद्द हो जाती है और सारे अरमान धरे रह जाते हैं।
जब सब कुछ सही होता है तब खाली पद और रिजर्वेशन के नाम पर प्रक्रिया में कोई खामी आ जाती है। जिसका खामियाजा भुगतता है युवा। हमारा सवाल सारे युवा और उनसे जुड़े लोगों से है।
क्या हमारे सिस्टम ये संभव नहीं कि किसी भी परीक्षा या प्रक्रिया के बाद जो योग्य उम्मीदवार हैं उन्हें नौकरी दे दी जाए। और जहां विवाद है सिर्फ उतने पदों को रोक कर आगे की कार्रवाई की जाए। इससे कम से कम ऐसे युवाओं की उम्मीद तो नहीं टूटेगी जो तैयारियों में दिन बिताते हैं।
न रात का होश रहता है न सुबह की फिक्र। बस किताबों में सिर खपाते हैं। वो कम से कम अपनी मंजिल तक पहुंच सकेंगे। या क्या शिक्षा विशेषज्ञों को बैठकर एक रास्ता निकालना चाहिए ताकि भर्ती परीक्षा से जुड़ा सिस्टम पहले से सॉलिड हो सके। क्योंकि राजनेता के लिए किसी भी प्रक्रिया पर सवाल उठाना आसान है।
ये जाहिर है कि वो सवाल किसी न किसी तबके की भलाई के लिए ही होता है, लेकिन सवाल का जवाब न मिले तो सफर युवाओं का पूरा समूह करता है।
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