
समझें क्या है पूरा मामला...
- कर्मचारियों ने प्रोबेशन वेतन व्यवस्था को चुनौती दी।
- वेतन 70 80 और 90 प्रतिशत मिलता था।
- पुराने निगम कर्मचारी फैसले का लाभ मिलेगा।
- याचिका में देरी राहत की बाधा नहीं बनी।
- आवेदन पर 60 दिन में निर्णय होगा।
कर्मचारियों को फिर मिली राहत
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच ने प्रोबेशन पीरियड के दौरान स्वास्थ्य कर्मचारियों को बड़ा आदेश दिया है। कोर्ट ने केवल 70%, 80% और 90% वेतन देने की शर्त पर एक बार फिर कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया है। यह मामला मल्टीपर्पज हेल्थ वर्कर्स (स्वास्थ्यकर्मियों) से जुड़ा हुआ है।
जस्टिस विशाल धगत की सिंगल बेंच ने कहा। डिवीजन बेंच इस मुद्दे पर फैसला दे चुकी है। समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों को राहत मिलनी चाहिए। हाईकोर्ट पहुंचने में देरी राहत रोकने का आधार नहीं है।
नियुक्ति आदेश की शर्त को दी गई थी चुनौती
याचिकाकर्ता मिथिलेश विश्वकर्मा एवं अन्य स्वास्थ्य कर्मचारियों ने अपनी नियुक्ति आदेश की उस शर्त को चुनौती दी थी। जिसमें तीन वर्षों तक क्रमशः न्यूनतम वेतनमान का 70%, 80% और 90% भुगतान किए जाने का प्रावधान रखा गया था। कर्मचारियों का कहना था कि डिवीजन बेंच पहले ही इस प्रकार की शर्त को गलत ठहरा चुकी है। इसलिए उन्हें भी वही लाभ मिलना चाहिए।
क्या कहा राज्य सरकार ने
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि कर्मचारियों की नियुक्ति वर्ष 2024 में हुई थी। जबकि उन्होंने लगभग तीन वर्ष बाद याचिका दायर की है। इसलिए वे फेंस सिटर हैं और उन्हें राहत नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा समान मुद्दे पर पहले से फैसला मौजूद है। देरी के आधार पर समान लाभ नहीं रोका जा सकता।
60 दिन में फैसला करने के निर्देश
हाईकोर्ट ने सभी याचिकाकर्ताओं को 15 दिनों के भीतर सक्षम अधिकारी के समक्ष अलग-अलग अभ्यावेदन देने के निर्देश दिए हैं। साथ ही संबंधित विभाग को आदेश दिया गया है कि आवेदन मिलने के 60 दिनों के भीतर डिवीजन बेंच के फैसले के अनुरूप निर्णय लिया जाए। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि कोई बकाया राशि बनती है तो उस पर विलंब अवधि का ब्याज नहीं मिलेगा।
क्या था डिवीजन बेंच का बड़ा फैसला?
दरअसल, 31 अक्टूबर 2025 को इंदौर बेंच की डिवीजन बेंच ने इंदौर नगर निगम की अपील खारिज करते हुए महत्वपूर्ण फैसला दिया था। इसी मामले को लेकर कुछ दिन पहले जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस बिनोद कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने अहम बात कही थी। नियमानुसार चयनित कर्मचारी पूरे न्यूनतम वेतनमान के हकदार हैं। प्रोबेशन से उनका यह अधिकार समाप्त नहीं होता। उन्हें समान पद के कर्मचारियों जैसा वेतन मिलना चाहिए।
हाईकोर्ट ने बताया, क्यों टिक नहीं सका यह नियम
डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा था कि यदि लोक सेवा आयोग से चयनित कर्मचारियों को पूरा न्यूनतम वेतनमान दिया जा सकता है, तो अन्य वैधानिक चयन प्रक्रिया से नियुक्त कर्मचारियों को कम वेतन देना समानता के सिद्धांत के विपरीत है।
कोर्ट ने माना कि एक ही प्रकार का काम करने वाले कर्मचारियों के बीच केवल नियुक्ति के माध्यम के आधार पर वेतन में अंतर करना न्यायसंगत नहीं है। इसी आधार पर अब जबलपुर बेंच ने भी कर्मचारियों को उसी फैसले का लाभ देने का रास्ता साफ कर दिया है
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