
समझें क्या है पूरा मामला
Bilaspur। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नार्को एनालिसिस, पॉलीग्राफ और ब्रेन मैपिंग जैसी वैज्ञानिक जांचों को लेकर महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के खिलाफ ऐसी जांच के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। संबंधित व्यक्ति की स्वतंत्र और पूरी जानकारी के साथ दी गई सहमति के बाद ही कोई टेस्ट कराया जा सकेगा।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने कहा कि जांच के नाम पर किसी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। टेस्ट कराने से पहले तय कानूनी प्रक्रिया और सुरक्षा उपायों का पालन करना जरूरी होगा।
रायगढ़ पुलिस की कार्रवाई पर उठे सवाल
यह मामला रायगढ़ जिले के चक्रधरनगर थाना क्षेत्र से जुड़ा है। यहां हत्या और साक्ष्य छिपाने के एक मामले की जांच चल रही थी। पुलिस ने जांच के दौरान लक्ष्मीनारायण पटेल और अर्धना भगत को संदेही मानकर पूछताछ के लिए बुलाया था।
दोनों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर आरोप लगाए। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनका नाम एफआईआर में दर्ज नहीं है। उनके खिलाफ कोई ठोस प्रमाण होने की जानकारी भी नहीं दी गई। इसके बावजूद पुलिस ने उन्हें लगातार थाने बुलाया और लंबे समय तक बैठाकर रखा।
याचिका में आरोप लगाया गया कि करीब 18 दिनों तक उन्हें बिना उचित नोटिस के पूछताछ के लिए बुलाया जाता रहा। उनके मोबाइल फोन भी कानूनी प्रक्रिया पूरी किए बिना जब्त कर लिए गए। इसके बाद उन्हें रायपुर ले जाकर नार्को और ब्रेन मैपिंग टेस्ट कराने का दबाव बनाया गया।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इन जांचों के लिए न तो उनकी स्वतंत्र सहमति ली गई और न ही किसी सक्षम न्यायिक अधिकारी से अनुमति प्राप्त की गई।
मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज करनी होगी सहमति
हाईकोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी किसी व्यक्ति के सामने वैज्ञानिक जांच का प्रस्ताव रख सकती है। हालांकि, संबंधित व्यक्ति की सहमति किसी सक्षम ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने ही दर्ज होगी।
मजिस्ट्रेट को यह सुनिश्चित करना होगा कि सहमति स्वेच्छा से दी गई है। व्यक्ति पर पुलिस, जांच एजेंसी या किसी अन्य पक्ष का दबाव नहीं होना चाहिए। टेस्ट से पहले व्यक्ति को जांच की प्रकृति, प्रक्रिया और संभावित प्रभावों की जानकारी देना भी आवश्यक होगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल लिखित हस्ताक्षर को सहमति नहीं माना जा सकता। सहमति सूचित, स्वतंत्र और बिना दबाव के होनी चाहिए। कानूनी सुरक्षा के बिना कराया गया टेस्ट व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के सेल्वी फैसले का उल्लेख
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित ‘सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य’ मामले में तय सिद्धांतों का पालन करने के निर्देश दिए हैं। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध नार्को एनालिसिस, पॉलीग्राफ या ब्रेन इलेक्ट्रिकल एक्टिवेशन प्रोफाइल टेस्ट नहीं कराया जा सकता।
कोर्ट ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की गाइडलाइन और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 में मौजूद सुरक्षा प्रावधानों का पालन करने को भी कहा। इन नियमों का उद्देश्य जांच और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना है।
आत्म-अभिशंसन से संरक्षण का अधिकार
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 20(3) किसी व्यक्ति को अपने ही खिलाफ गवाही देने के लिए मजबूर किए जाने से सुरक्षा देता है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, जबरन वैज्ञानिक जांच कराना इस संवैधानिक अधिकार और व्यक्ति की निजता को प्रभावित कर सकता है।
ऐसी जांचों में व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक स्थिति पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है। इसी कारण न्यायिक निगरानी, कानूनी सलाह और स्वतंत्र सहमति को जरूरी माना गया है।
मामले की सच्चाई पर कोर्ट ने नहीं दी राय
हाईकोर्ट ने फिलहाल हत्या मामले की जांच या याचिकाकर्ताओं पर लगे संदेह की सच्चाई को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की है। अदालत का आदेश वैज्ञानिक जांच की प्रक्रिया और जांच एजेंसियों की कानूनी सीमाओं से संबंधित है।
इस फैसले के बाद छत्तीसगढ़ में पुलिस और अन्य जांच एजेंसियों को नार्को, पॉलीग्राफ या ब्रेन मैपिंग टेस्ट कराने से पहले तय प्रक्रिया का पालन करना होगा। बिना स्वतंत्र सहमति और न्यायिक निगरानी के किसी भी व्यक्ति को ऐसी जांच के लिए बाध्य नहीं किया जा सकेगा।
महत्वपूर्ण तथ्य
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बिना सहमति नार्को, पॉलीग्राफ और ब्रेन मैपिंग टेस्ट पर रोक लगाई।
सहमति संबंधित व्यक्ति की स्वतंत्र और पूरी जानकारी के साथ होनी चाहिए।
सहमति सक्षम ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज की जाएगी।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के सेल्वी फैसले और NHRC गाइडलाइन का पालन जरूरी बताया।
जबरन वैज्ञानिक जांच संविधान के अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन हो सकती है।
मामला रायगढ़ के चक्रधरनगर थाना क्षेत्र की हत्या जांच से जुड़ा है।
याचिकाकर्ताओं ने पुलिस पर बिना नोटिस लगातार बुलाने और मोबाइल जब्त करने का आरोप लगाया।
हाईकोर्ट ने हत्या मामले की मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं की।
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