छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के एक आदेश को निरस्त करते हुए आयोग की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि आयोग एक सलाहकार और सिफारिश करने वाली संस्था है।
ऐसा न्यायिक मंच नहीं जो किसी व्यक्ति से रकम की वसूली का आदेश जारी कर सके। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आयोग को कमर्शियल विवादों में रिकवरी के निर्देश देने का अधिकार कानून ने नहीं दिया है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि आयोग की सलाह आमतौर पर राज्य सरकार के लिए बाध्यकारी हो सकती है, लेकिन वह असल में रिकवरी का आदेश जारी करके किसी सक्षम अधिकारी की शक्तियों का इस्तेमाल नहीं कर सकती।
हार्वेस्टर सौदे से शुरू हुआ पूरा विवाद
मामले की सुनवाई जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ में हुई। याचिकाकर्ता कमला मोटर्स ने एक हार्वेस्टर मशीन 21 लाख रूपए में बेचने का सौदा किया था, जिसके लिए खरीदार की ओर से 30 हजार रूपए अग्रिम राशि दी गई थी। लेकिन तय समय में बैंक फाइनेंस नहीं मिलने और कोविड-19 महामारी के कारण डिलीवरी में देरी होने से सौदा पूरा नहीं हो सका।
बाद में फाइनेंस मिलने पर मशीन उपलब्ध कराई गई, लेकिन खरीदार ने सौदा रद्द कर दिया और आयोग सहित कई अधिकारियों के समक्ष शिकायत दर्ज करा दी।
वसूली के आदेश से शुरू हुआ विवाद
शिकायत पर सुनवाई के बाद छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग (Backward Classes Commission) ने कलेक्टर को निर्देश दिया कि कमला मोटर्स से 1 लाख 26 हजार 500 रूपए की वसूली कर यह राशि खरीदार को दिलाई जाए। इसी आदेश को कमला मोटर्स ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याचिकाकर्ता का कहना था कि आयोग को किसी भी व्यक्ति से रकम वसूलने या वसूली का आदेश देने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।
कोर्ट ने समझाया आयोग का असली दायरा
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 1995 की धारा-9 का हवाला देते हुए कहा कि आयोग का दायित्व मुख्य रूप से सरकार को सलाह देना, सिफारिश करना और पिछड़े वर्गों से जुड़े मामलों की निगरानी करना है।
आयोग की भूमिका प्रशासनिक और सलाहकार प्रकृति की है। उसे किसी न्यायालय या सक्षम प्राधिकारी की तरह रिकवरी के आदेश जारी करने की शक्ति प्राप्त नहीं है।
सिविल कोर्ट नहीं बन जाता आयोग?
कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि जांच और सुनवाई के दौरान आयोग को सिविल कोर्ट जैसी कुछ सीमित शक्तियां जरूर मिली हैं, लेकिन इससे आयोग सिविल कोर्ट नहीं बन जाता।
न्यायालय ने कहा कि किसी मामले की जांच करने और साक्ष्य लेने की शक्ति का अर्थ यह नहीं है कि आयोग सीधे आर्थिक दायित्व तय कर वसूली के आदेश जारी कर सके।
कमर्शियल विवाद में लांघी अधिकारों की सीमा
हाईकोर्ट (CG High Court) ने माना कि यह पूरा विवाद एक व्यावसायिक लेन-देन से जुड़ा था। ऐसे मामले में किसी पक्ष से राशि वसूलकर दूसरे पक्ष को भुगतान करने का निर्देश देना आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर था।
कोर्ट ने कहा कि इस तरह का आदेश केवल सिफारिश नहीं माना जा सकता, बल्कि यह न्यायिक शक्ति का प्रयोग है, जिसकी अनुमति कानून आयोग को नहीं देता।
आयोगों के लिए भी तय है संवैधानिक सीमा
इस फैसले को केवल एक मामले तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे राज्य के सभी वैधानिक आयोगों के अधिकार क्षेत्र से जुड़ा महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है। हाईकोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि प्रत्येक आयोग को अपने वैधानिक दायरे में रहकर ही काम करना होगा।
कानून से बाहर जाकर दिए गए आदेश न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं सकते। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में आयोगों की कार्यप्रणाली के लिए भी अहम नजीर माना जा रहा है।
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