
ग्वालियर हाईकोर्ट ने देरी से दायर सेवा याचिकाओं पर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक न उठाया गया विवाद डेड इशू बन जाता है। बार-बार अभ्यावेदन देने से नया कानूनी अधिकार पैदा नहीं होता। यह टिप्पणी रामनिवास गुप्ता की अपील पर सुनवाई के दौरान आई। गुप्ता को 1999 की नियुक्ति के 12 साल बाद कोर्ट जाने पर राहत नहीं मिली।
क्या था पूरा विवाद
रामनिवास गुप्ता को 1980-81 में तदर्थ सहायक शिक्षक नियुक्त किया गया था। बाद में उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। यह मामला लंबे समय तक अटका रहा। बाद में ट्रिब्यूनल के आदेश पर स्क्रीनिंग कमेटी ने इस पर दोबारा विचार किया।
नई नियुक्ति और चुप्पी
13 जुलाई 1999 को कमेटी ने गुप्ता को सहायक शिक्षक की जगह शिक्षा कर्मी वर्ग-3 बनाया। गुप्ता ने यह नियुक्ति स्वीकार कर ली। उन्होंने उसी समय सेवा भी जॉइन कर ली। लेकिन उन्होंने इस फैसले को तुरंत चुनौती नहीं दी।
कोर्ट क्यों पहुंचे गुप्ता
गुप्ता करीब 12 साल तक चुप रहे। साल 2011 में उन्होंने पहली बार हाईकोर्ट का रुख किया। कोर्ट ने शिक्षा विभाग को उनका अभ्यावेदन तय करने को कहा। विभाग ने 17 अक्टूबर 2012 को उनका अभ्यावेदन खारिज कर दिया।
दूसरी याचिका भी खारिज
गुप्ता ने 2014 में दोबारा याचिका दायर की। एकल पीठ ने अत्यधिक देरी के आधार पर इसे खारिज किया। इसके खिलाफ गुप्ता ने डबल बेंच में अपील की। लेकिन डबल बेंच ने भी एकल पीठ का फैसला सही ठहराया।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
डबल बेंच ने कहा, कानून सतर्क रहने वालों का साथ देता है। 1999 का विवाद 12 साल तक क्यों नहीं उठाया गया, इसका कोई ठोस कारण नहीं बताया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बार-बार आवेदन देना दया की याचना भर है। इसे कानूनी उपाय नहीं माना जा सकता।
नया कारण-ए-कार्य (Cause of Action) नहीं बनता
कोर्ट ने कहा, अंतिम निर्णय के बाद बार-बार आवेदन से नया विवाद पैदा नहीं होता। ऐसे आवेदनों से कानूनी समय-सीमा भी दोबारा शुरू नहीं होती। इसलिए देरी से दायर याचिका राहत का आधार नहीं बन सकती।
फैसले का असर
यह फैसला सेवा विवादों में देरी से याचिका दायर करने वालों के लिए अहम संदेश है। कोर्ट का रुख साफ है, अधिकारों के प्रति सतर्क रहना जरूरी है। देर से जागने पर राहत की उम्मीद कम हो जाती है। यह फैसला भविष्य के मामलों में नजीर बन सकता है।
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याचिका खारिज
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