
समझें क्या है पूरा मामला...
- सीधी कांग्रेस भवन में प्रवक्ता व विधानसभा प्रभारी डॉ. विनोद शर्मा के साथ कथित धक्का-मुक्की हुई।
- घटना के बाद कांग्रेस ने दो नेताओं को तत्काल आजीवन निष्कासित कर दिया है।
- पार्टी की कार्रवाई के बावजूद विवाद की असली वजह पर सवाल बरकरार है।
- सूत्रों के अनुसार विंध्य में वर्चस्व की लड़ाई और गुटबाजी इस विवाद की बड़ी वजह मानी जा रही है।
- घटना वाले दिन दोनों नेताओं की विधायक अजय सिंह के साथ तस्वीरें भी चर्चा में रहीं।
- इससे पहले दीपक बावरिया प्रकरण और हाल ही में यूथ कांग्रेस की बैठक में भी विवाद सामने आ चुका है।
मध्य प्रदेश कांग्रेस में गुटबाजी और वर्चस्व की लड़ाई थमने का नाम नहीं ले रही है। विंध्य क्षेत्र एक बार फिर पार्टी के लिए विवाद का केंद्र बन गया है। सीधी कांग्रेस कार्यालय में प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता और सीधी विधानसभा प्रभारी डॉ. विनोद शर्मा के साथ कथित धक्का-मुक्की हुई। हाथापाई के बाद पार्टी ने दो नेताओं को तत्काल प्रभाव से आजीवन निष्कासित कर दिया है।
वहीं, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल निष्कासन से पूरा मामला खत्म हो गया, या फिर घटना के पीछे की असली वजह की निष्पक्ष जांच भी होनी चाहिए थी?
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सीधी से फिर उठे कांग्रेस की गुटबाजी के सवाल
सीधी कांग्रेस भवन में उस समय विवाद खड़ा हो गया जब प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता और सीधी विधानसभा प्रभारी डॉ. विनोद शर्मा के साथ कथित रूप से धक्का-मुक्की और अभद्र व्यवहार हुआ। बताया गया कि वरिष्ठ नेता अजय सिंह के रवाना होने के बाद दो नेताओं ने बहस शुरू की, जो देखते-देखते छीना-झपटी तक पहुंच गई। संगठन को शिकायत मिलने के बाद दोनों नेताओं को आजीवन निष्कासित कर दिया गया।
हालांकि, राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि क्या केवल कार्रवाई कर देना ही पर्याप्त था या फिर पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच भी होनी चाहिए थी, ताकि घटना के पीछे की वास्तविक वजह सामने आ सके।
क्या निष्कासन से दब गया असली विवाद?
कांग्रेस ने तत्काल अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए दोनों नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। वहीं, पार्टी के कई नेताओं का मानना है कि इससे मूल कारण सामने नहीं आए।
नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कुछ वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि यदि घटना की निष्पक्ष जांच होती तो यह भी स्पष्ट होता कि आखिर विवाद किस वजह से बढ़ा था। साथ ही, इसके पीछे किसका प्रभाव या समर्थन था।
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विंध्य में वर्चस्व की लड़ाई या संगठनात्मक विवाद?
सूत्रों के मुताबिक यह मामला केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं माना जा रहा है। विंध्य क्षेत्र में लंबे समय से अलग-अलग गुटों के बीच राजनीतिक वर्चस्व की खींचतान चल रही है।
जानकारों का कहना है कि क्षेत्र में जातीय और राजनीतिक समीकरणों की प्रतिस्पर्धा भी समय-समय पर संगठन के भीतर तनाव की वजह बनती रही है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
उमंग सिंघार के दौरे के बाद बढ़ी दूरियां?
सूत्र बताते हैं कि नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के रीवा दौरे के दौरान लगे पोस्टरों और स्वागत को लेकर भी कई नेताओं के बीच नाराजगी सामने आई थी। उसी समय से अलग-अलग गुटों के बीच दूरी बढ़ने की चर्चा राजनीतिक हलकों में होती रही है।
इसी पृष्ठभूमि में सीधी की घटना को भी कई नेता उसी गुटीय संघर्ष की कड़ी मान रहे हैं।
2018 का दीपक बावरिया प्रकरण भी बना था सुर्खियों में
विंध्य क्षेत्र में कांग्रेस की अंदरूनी कलह कोई नई बात नहीं है। जुलाई 2018 में तत्कालीन प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया के रीवा दौरे के दौरान भी भारी हंगामा हुआ था।
मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर दिए गए उनके बयान के बाद समर्थकों ने विरोध किया और कथित धक्का-मुक्की की घटना सामने आई। बाद में पार्टी ने अनुशासनहीनता के आरोप में छह कार्यकर्ताओं को निष्कासित कर दिया था।
भोपाल में भी नहीं थमा विवाद
हाल ही में भोपाल में हुई युवा कांग्रेस की राज्य कार्यकारिणी की बैठक भी विवादों में रही। संगठनात्मक समीक्षा के दौरान प्रदर्शन मापने वाले ऐप की विश्वसनीयता पर सवाल उठे तो बहस इतनी बढ़ गई कि दो पदाधिकारियों के बीच धक्का-मुक्की की नौबत आ गई।
प्रदेश अध्यक्ष यश घनघोरिया और अन्य वरिष्ठ नेताओं के हस्तक्षेप के बाद मामला शांत कराया गया। बाद में दोनों पक्षों ने विवाद समाप्त होने की बात कही, लेकिन घटना का वीडियो सामने आने के बाद संगठन की कार्यशैली पर सवाल उठे।
संगठन मजबूत होगा या गुटबाजी भारी पड़ेगी?
एक ओर कांग्रेस प्रदेश नेतृत्व संगठन को मजबूत करने का दावा कर रहा है। वहीं दूसरी ओर बार-बार सामने आ रहे ऐसे विवाद पार्टी की छवि पर असर डाल रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि अंदरूनी मतभेद सार्वजनिक विवाद में बदलते रहे तो आगामी चुनावों में इसका असर संगठन की एकजुटता और चुनावी रणनीति दोनों पर पड़ सकता है।
बड़ा सवाल
सीधी से लेकर भोपाल और उससे पहले रीवा तक लगातार सामने आए विवाद क्या सिर्फ अनुशासनहीनता के मामले हैं, या फिर कांग्रेस के भीतर गहराती गुटबाजी का संकेत? क्या केवल निष्कासन पर्याप्त है, या संगठन को ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक कारणों का समाधान भी तलाशना होगा?
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